उन्होंने कहा कि यह अनुदान वर्ष 1952 से 15वें वित्त आयोग तक राज्यों की वित्तीय स्थिरता के लिए निरन्तर मिलता रहा है, जिसे 16वें वित्त आयोग ने पहली बार बन्द किया है, जो हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी व कठिन भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य के प्रति अन्याय है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश पेड़ों के कटान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर देश के पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ हिमाचल से बहने वाली नदियों के माध्यम से पानी भी उपलब्ध करवाता है तथा केन्द्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बंद करना प्रदेश के हितों के साथ कुठाराघात है।
उन्होंने कहा कि 15वें वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश के लिए 37199 करोड़ रुपये के राजस्व घाटा अनुदान की सिफारिश की थी। इसके अलावा कोरोना काल के दौरान पिछली भाजपा सरकार को वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर राजस्व घाटा अनुदान के रूप में 11,431 करोड़ रुपये की सहायता मिली थी। उन्होंने कहा कि अनुदान बंद कर देने से राज्य को लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का नुक्सान होगा। ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार को अब कुशल वित्तीय प्रबंधन के साथ-साथ राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए कड़े फैसले लेने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार के आगामी बजट में मध्यम वर्ग और किसानों की अनदेखी की गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि एवं बागवानी है, परन्तु केन्द्रीय बजट में बागवानों के लिए न तो किसी सब्सिडी का प्रावधान है और न ही किसी बुनियादी ढांचे के विकास का जिक्र है। उन्होंने कहा कि भानुपल्ली-बिलासपुर एवं चण्डीगढ़- बद्दी रेल परियोजनाओं के विस्तार के लिए भी कोई ठोस घोषणा नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि यह बजट कॉपरेटिव फैडेरलिज्म की भावना क विरूद्ध है तथा हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे पहाड़ी राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें कर्ज बोझ तले दबाने के प्रयास का एक दस्तावेज है। उन्होंने केन्द्र सरकार से राजस्व घाटा अनुदान को बहाल करने व प्रदेश को विशेष आर्थिक पैकेज देने की मांग की। बैठक मे उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान, विभिन्न विभागों के प्रशासनिक सचिव, विभागाध्यक्ष तथा संबंधित उपायुक्त व अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।