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हिपा में अंगदान जागरूकता शिविर आयोजित

शिमला, 09 मई 26 (RHNN) : शिमला के डॉ मनमोहन सिंह हिमाचल प्रदेश लोक प्रशासन संस्थान (हिपा) में शनिवार को स्टेट ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) हिमाचल प्रदेश की ओर से अंगदान जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। इसमें अर्ली राइजर संस्था के पदाधिकारियों सहित आगामी मैराथन के प्रतिभागियों ने अंगदान के प्रति विस्तृत जानकारी ली।इस दौरान प्रतिभागियों को अंगदान व नेत्रदान संबंधी पैंफलेट बांटे गए। सोटो की मीडिया व आईईसी कंसल्टेंट रामेश्वरी ने बताया कि भारत में अंग एवं उत्तक दान वी प्रत्यारोपण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की ओर से राज्य अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो) की स्थापना की गई है। इसका उद्देश्य मरणोपरांत अंग एवं उत्तक दान को बढ़ावा देकर प्रत्यारोपण प्रणाली से जरूरतमंद मरीजों के जीवन में सुधार करना है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष हो वह स्वैच्छिक रूप से अपने करीबी रिश्तेदारों को चिकित्सा के उद्देश्य से नियमों के दायरे में रहते हुए अंगदान कर सकता है। वह जीवन काल के दौरान किडनी और लीवर का कुछ हिस्सा दान कर सकता है। वही मरने के बाद यानी ब्रेन स्टेम डेड की स्थिति में वह आठ अंग दान कर सकता है।

मरने के बाद अंगदान करने की इच्छा हेतु कोई भी व्यक्ति अंगदान का शपथ पत्र भर के अंगदाता बन सकता है। कोई भी व्यक्ति www.notto.abdm.gov.in पर आधार लिंकड मोबाइल नंबर की सहायता से फॉर्म भर सकता है। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि अंगदान व नेत्रदान के प्रति जागरूक हों और समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाने में अपना सहयोग दें।

क्या है ब्रेन स्टेम डेथ : ब्रेन स्टेम जीवन को बनाए रखने के लिए मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ब्रेन स्टेम डेड व्यक्ति स्वयं सांस नहीं ले सकता , सांस लेने के लिए वह वेंटिलेटर पर निर्भर होता है , ब्रेन स्टेम का कार्य न करना मृत्यु का लक्षण है । मस्तिष्क में क्षति पहुंचने के कारण ऐसी स्थिति होती है। इस प्रकार के रोगी को ब्रेन स्टेम डेड घोषित किया जाता है। कोमा के मरीज और ब्रेन स्टेम डेथ के मरीजों में अंतर होता है। कोमा रोगी मृत नहीं होता जबकि ब्रेन स्टेम डेड वाले व्यक्ति की स्थिति कोमा से अलग होती है ।इसमें व्यक्ति चेतना और सांस लेने की क्षमता हासिल नहीं कर पता है। हृदय कुछ घंटे या कुछ दिनों के लिए वेंटीलेटर की वजह से कार्य कर सकता है ।इस अवधि के दौरान करीबी रिश्तेदारों की सहमति से अंग लिए जा सकते हैं। अंग कभी भी दाताओं के जीवन की कीमत पर नहीं लिए जाते।

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